
हमलोग थकहार कर पुन: वन प्रमंडल पदाधिकारी को अपनी व्यथा सुनाई कि मुझसे तो गाँव के लोग बात करने से कतराते हैं, समिति क्या बनायेंगे ? इसपर उन्होंने मेरी बात को गंभीरता से लिया और बोले कि घबराने कि बात नही है ये तो होगा ही, जिस गाँव के पांच - दस लोग जेल जा चुके हैं वो तो आपको अपना दुश्मन मानेगें हीं। आप जंगल गस्ती के पूर्व गाँव जरुर जाइएये उनको समझाईएये अगर आपको लगता है कि कोई बेगुनाह या प्रथम बार अपराध करने वाले पर केस हो गया है तो उसकी भी सूची बनायें। हमलोग उसका केस उठा लेंगे, इससे हमलोगों पर उनका विश्वास बढेगा और जैसे हीं आपको लगे कि सात लोग या पांच लोग भी वन सुरक्षा समिति बनाने हेतु तैयार हो गये हैं , आप मुझे सूचित करें, मैं उस गाँव में जाकर आपकी उपस्थिति में उनको समझाकर सामिति का गठन कर दूंगा।
निर्देशानुसार मैने कार्यवाई शुरू की दसियों के करीब छोटे वन अपराधियों की सूची वन पदाधिकारी को दी। उनका केस सुलह हुआ तत्पश्चात उनके गाँव में मेरी इज्जत होने लगी।मैंने भी अपनी पूर्व की कठोर कार्यवाई एवं गिरफ़्तारी की कार्यवाई में नरमी बरतना शुरू किया तथा ज्यादा कार्य ग्रामीणों के बीच करना शुरू किया। ग्रामीण न सिर्फ मेरी गतिविधियों पर ध्यान देने लगे बल्कि मैंने कई एक गाँव में गस्ती करते करते पहुंचता था एवं विद्यालय में बच्चों की एकाध क्लास भी लेता था, कभी उन्हें गणित के कुछ सवाल को हल करता था, कभी जनरल नौलेज से संबंधित जानकारियां देता था। ग्रामीणों की भीड़ जब जमा होती थी तो उसमे से कुछ नवयुवको को, जो जमीन नाप जोख में रूचि रखते थे, उन्हें सर्वे करने का तरीका बताने लगा। ये बात मेरे मन मे दोनईकला गाँव के एक नवयुवक ने डाली थी कि इस गाँव के लोग कम पढ़े-लिखे हैं एवं जमीन का झगड़ा हमेशे होते रहता है, किसी को नक्सा नहीं देखने आता है इसलिए आमीन उल्टा-पुल्टा सर्वे कर कभी किसी का जमीन, दूसरे की जमीन मे निकाल देता है।
तब मैं जब भी किसी गाँव में गया वनपाल प्रशिक्षण मे दिये गए सर्वेक्षण का प्रशिक्षण काफी काम आया और मैंने ग्रामीणों को मामूली जानकारी जैसे नक्सा देखने एवं गुनिया से नापने की कला सिखाई। जिससे ग्रामीणों ने मुझे अपना शुभचिंतक समझा एवं अन्य छोटे मोटे मामलों मे भी उनका सहयोग मै करता रहा तथा अपना मुख्य लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा वन सुरक्षा समिति का गठन करना शुरू किया। इस दौरान मैंने अपने परिसर के सभी मौजाओं में वन सुरक्षा समिति का गठन कर लिया। मेरे चार कमिटियों के गठन में वन प्रमंडल पदाधिकारी भी उपस्थित हुए। मैं ऐसे गाँव में वन प्रमंडल पदाधिकारी को ले गया, जहाँ के बुजुर्ग ग्रामीण ने ये कह डाला कि - आज तक इस गाँव में कोई डी एफ ओ क्या कोई रेंजर तक नहीं आया था।
आगे-................ " जब वन प्रमंडल पदाधिकारी ने जेहादी अंदाज दिखाया।"