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शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2007

जब मैंने वनपाल की नौकरी छोड़नी चाही


वह वक्त था ; वर्ष - १९९० का। मेरा पदस्थापन हजारीबाग पश्चिमी वन प्रमंडल के राजडेरवा परिसर में हुआ। प्रशिक्षण के बाद घने जंगलों के बीच पहला कार्य पदस्थापन था। मै एक अविवाहित नवयुवक था और सीधे विश्वविद्यालय की पढाई छोड़ कर सरकारी सेवा मे आया था। पदस्थापन के दूसरे दिन ही वन प्रमंडल पदाधिकारी से साक्षात्कार करने हजारीबाग पहुँच गया और उनसे अनुरोध किया कि मेरी पदस्थापन दूसरी जगह कर दें , मैं वहाँ नहीं रह पाऊँगा। वन प्रमंडल पदाधिकारी मेरी भावना से अवगत हुए , मेरी पूरी बात को सुना एवं मुझे आश्वस्त किया कि मैं जरूर आपकी बात सुनूंगा, कल मैं पार्क आऊँगा वहीं विस्तार से बात करूँगा ।
दूसरे दिन नियत समय से वे राजडेरवा आये एवं मुझे, वन क्षेत्र पदाधिकारी एवं दो वनरक्षियों को साथ लेकर पैदल जंगल की ओर निकल गए एवं मेरी पूरी समस्या सुनी और क्षेत्र पदाधिकारी को एक तरफ ले जाकर कहते मैंने सुना -"ये नया लड़का है, शहर से आया है, इसको नौकरी में रूचि जगाइए, थोडी नरमी बरतिएगा, अच्छा काम करेगा ।" फिर मेरे पास आकर बोले - मै आपकी बात पर विचार करूँगा, आप नवयुवक हैं कुछ काम दिखाईये, यहाँ कटिंग की समस्या है, इसको कंट्रोल कीजिए, आपको इसके लिए जितने स्टाफ चाहिए, वाहन चाहिए मुझको बताये । दिन भर की नौकरी एवं पहली प्रशासनिक अनुभव ने मुझे अन्दर से हिला दिया था। मेरी बात तो सूनी गयी लेकिन उसका प्रतिफल मुझे तुरंत नही मिलने वाला था, इसके लिए मुझे राजडेरवा में अपना मुख्यालय रखना पड़ता एवं इस घनघोर जंगल में जहाँ १० किलोमीटर की परिधि में कोई आबादी नहीं थी। सिर्फ ५किलोमीटर के दूरी पर १० घर के एक बस्ती कैले था, जहाँ मुश्किल से गाय का शुद्ध दूध मिलता था।
ऐसी मनःस्थिति मे अन्तिम रूप से निर्णय लिया कि मैं इस नौकरी को छोड़ दूंगा और इसकी सूचना मैंने अपने बडे भाई साहब श्री विद्या सागर सिंह , जो उस वक्त पुलिस ट्रेनिग कॉलेज हजारीबाग में अवर निरीक्षक का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे उन्हें दी। मेरी बात सुनकर वे दु:खित हुए एवं मुझे अपने फैसले पर पुन: विचार करने कि सलाह दी। ...........आगे... Sunday, 18 November, २००७ -''हजारीबाग वन्यप्राणी आश्रयणी में वन अपराध पर अंकुश लगा!"

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