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बुधवार, 21 नवंबर 2007

जब वन सुरक्षा समिति के गठन की परिकल्पना ने जन्म लिया!

रात दिन की गस्ती एवं वन अपराधियों की गिरफ़्तारी तथा वन पदार्थ की जप्ती लगातार जरी थी, ये सिलसिला तीन माह तक चला लेकिन हजारीबाग वन्य प्राणी आश्रयणी वृक्षों की कटाई पर पूर्णत: रोक नही लगा। रोज जन प्रतिनिधि, जागरुक नागरिक एवं पत्रकार वन्य प्राणी आश्रयणी में अवैध पातन की शिक़ायत हजारीबाग से पटना तक पहुँचा रहे थे तथा उच्चाधिकारियों के तीखे तेवर दुविधा में डाल दिये थे। ये समय की परीक्षा थी कि क्या अवैध पातन पूर्णत: रूक पायेगा? इतनी गिरफ्फ्तारी, गस्ती एवं जप्ती के बाद भी पूरे वन्य प्राणी आश्रयणी से प्रतिदिन २० से ३० बैलगाडी सखुआ का सैपलिंग [बाल वृक्ष] काटा जा रहा था। ग्रामीण एवं वन अपराधी प्रतिदिन ये कार्य कर रहे थे। हमलोग रात्रि गस्ती एक ओर जाते तो सुबह खबर मिलती की फलां जगह से १० सगड़ [बैलगाडी] लकडी निकल गया। अत: ये सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा था। तब मन में ये बात आयी की और कोई रास्ता अवैध पातन से निपटने का हो सकता है क्या ?..........आगे -''जब वन अपराध की विभिन्न धारायो को ग़ैर जमानती एवं संज्ञेय अपराध घोषित की गयी!"

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