
फरवरी 2007 की नियत तिथि को मैं धनबाद न्यायालय के एक कोर्ट के विट्नेस बॉक्स में खड़ा था। बचाव पक्ष के अधिवक्ता हमसे सवाल पूछा, “आप इस केस के अनुसंधान पदाधिकारी हैं?” मैंने कहा, “जी हाँ”, “क्या आप जाँच के दौरान घटना स्थल पर गये थे?” मैंने कहा, “जी हाँ”, “आप वहाँ पर क्या पाया?” मैंने कहा, “मैंने एक अर्धनिर्मित पक्का मकान बना हुआ पाया जो प्लिंथ लेबल तक बना था, जिसका पार्ट भाग वन भूमि पर निर्मित था, अतः वनरक्षी का अपराध प्रतिवेदन सही पाया”, इसके बाद अधिवक्ता महोदय ने सवाल किया, “क्या मालूम है कि आरोपी अनुसूचित जन-जाति का है?” मेरा जबाब था, “जी हाँ, ये जानकारी अपराध अनुसन्धान के दौरान मेरे समक्ष आयी”, अधिवक्ता महोदय ने आगे कहा, “आप ने अनुसन्धान में ये भी पाया कि आरोपी सरकार की योजना अंतर्गत तोंपचाँची प्रखण्ड द्वारा उपलब्ध कराई गयी इन्दिरा आवास के अंतर्गत आवंटित राशि से मकान बना रहा था, जिसे रोक दिया गया था”, मैंने कहा, “ये सत्य है”, अधिवक्ता ने आगे कहा, “आपको पता है कि आरोपी अब उसी मकान में रह रहा है”, मैंने कहा, “मुझे नहीं मालूम क्योंकि मेरा स्थानांतरण वर्ष 1999 में हीं यहाँ से हो गया था”। तत्पश्चात मेरे गवाही को कलमबद्ध किया गया।
10 वर्ष की सजा: मैनें उक्त घटना की सजीव चित्रण इस लिए किया क्योंकि मुझे खुद नहीं पता था कि ये घटना दस वर्ष पुरानी थी, यानि वर्ष 1997 की थी। मैने जब केस रिकॉड का कोर्ट कक्ष में अध्ययन किया तो अपने जाँच प्रतिवेदन पर हीं अचम्भित था, क्योंकि मुकदमा मात्र 1400 रुपये के वनक्षति का तथा इन्दिरा आवास निर्माण का था एवं इसका स्पष्ट जिक्र मैंने अपने अनुसन्धान प्रतिवेदन में कर रखा था। मुझे आश्चर्य इस पर भी हो रहा था कि इस गरीब ने तो दस वर्ष सालों तक कोर्ट का चक्कर लगया वो भी एक छोटी भूल के लिए, जिसमें आरोपी की आंशिक गलती थी। गलती तो प्रखंड कार्यालय ने भी की थी, लेकिन खामियाजा इसे भुगतना पड़ा। उक्त विचारों का आदान-प्रदान माननीय न्यायिक दण्डाधिकारी के कार्यालय कक्ष में भोजन अवकाश के दौरान हो रही थी। माननीय न्यायिक पदाधिकारी काफी गम्भीर तथा द्रवित थे। वे जानना चहते थे कि आरोपी तो अनपढ़ एवं गरीबी रेखा के नीचे का नागरिक है फिर इसने ऐसा कार्य क्यों किया? मै चूकि जाँच पदाधिकारी था अतः न्यायिक प्रक्रिया से अलग हटकर मानवता की ख़ातिर अपराध की अतीत जानने को उत्सुक थे। पूरी घटना फ्लैस-बैक की तरह मुझे स्मारित हो गयी। मैंने कहा, “सरकारी कार्य व्यवस्था का बली ये गरीब चढ़ गया है, मुकदमा तो प्रखण्ड विकाश पदाधिकारी पर भी होनी चाहिए थी जिन्होंने घटना स्थल का निरीक्षण (स्थल चयन) कर निर्माण की अनुमति दी। जिस जगह यह वन भूमि में करीब पाँच फीट घुसा है, उसी के बगल में आरोपी इस भूमिहीन परिवार की गैर मजरुआ जमीन का आवंटन सरकार (प्रखण्ड) के द्वारा किया गया है। नाप-जोख में गड़बड़ी की वजह से भूलवश जंगल की जमीन में घुस गया। गलती तो मेरे वनरक्षी की भी है, जिसने सही समय पर जाकर उसे रोका नहीं था। जमीन की बनावट भी ऐसी है कि कहीं पिलर नज़र नहीं आता एवं वनभूमि, रैयत तथा गैर मजरुआ भूमि में सिर्फ आँखो से देखकर अंतर करना मुश्किल है। घटना जब प्रकाश में आयी तो मैंने वनरक्षी से तहकिकात किया तो उसने तुरंत अपराध प्रतिवेदन थमा दिया। मैं घटना की जाँच के लिए गया और घटना स्थल पर हीं पूछा कि आपने इन्दिरा आवास आवंटी पर मुकदमा ठोक दिया, क़्या यही हमारी कार्यपद्धति है? जो व्यक्ति अपना घर अपने पैसे से नहीं बना सकता, शरीर पर ढ़ंग से कपड़ा नहीं है, वह अब मुकदमा लड़ेगा, मै विफ़र था लेकिन न्यायिक प्रक्रिया से बँधा था और मुझे वनरक्षी के अपराध प्रतिवेदन को स्वीकार करना पड़ा। उस गरीब की दस वर्षो की मांसिक एवं आर्थिक पीड़ा को मैं और न्यायिक पदाधिकारी सिर्फ महसूस करने की कोशिश कर रहे थे कि इस एक छोटी सी भूल के लिए कितनी बड़ी सजा मिल गयी।
क्रमशः..................
प्रेम सागर जी, आपने इतनी संवेदनशीलता का परिचय दिया वह भी सराहनीय है वर्ना नौकरशाही तो आज गरीब की चमड़ी भी उधेड़ लेती है वह भी बिना किसी अपराध बोध के. विदेश से आई बेटे की लाश को उसके बाप को सौपने के लिए दिल्ली पुलिस का इंसपेक्टर पॉँच हजार रुपये की रिश्वत मांगता है. नगर निगम का क्लर्क मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने के लिए रिश्वत मांगता है. आखिर ऐसे संवेदन हीन नौकरशाही को यह रीढविहीन समाज कब तक ढोयेगा ?
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