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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

पैसा न होतई तो कर्जा ले लेबई हुज़ुर:सन्दर्भ इंदिरा आवास आवंटी

मैं गवाही के उपरांत कोर्ट पदाधिकारी से उपस्थिति सम्बंधी प्रमाण-पत्र प्राप्त करने हेतु कोर्ट कक्ष के वकील बेंच में बैठा इंतजार कर रहा था। भोजन अवकास के उपरांत पुनः कोर्ट की कार्यवाही शुरू हुई। आरोपी भी अगली तिथि लेने के लिए कोर्ट कक्ष में हीं एक कोने में खड़ा था। माननीय न्यायिक दंडाधिकारी उसे देखते हुए बोले,तुमको कौन तिथि चाहिए? आरोपी निश्चल भाव से बोला,हुज़ुर, अबर लम्बा समय दे दिजिए, लड़की की शादी अगले हप्ता में है। न्यायिक दण्डाधिकारी हमारी ओर देख रहे थे, मैं भी निशब्द उनकी ओर देख रहा था। वे चिंतित एवं व्यथित थे। उन्होने आरोपी को कहा,तुम्हीं बताओ किस तिथि को अगली सुनवाई रखें। आरोपी बोला,अगला महीना के पहली के हुज़ुर दे दिया जाता तो सहुलियत होता,तत्पश्चात दण्डाधिकारी महोदय ने अपने पेशकार को उक़्त कार्यवाई करने का निर्देश दिया एवं उसकी ओर मुखातिब होकर बोले,सुनो, तुम कौन वकील के चक्कर में पड़े हो जो तुम्हें 1400 रुपये का केस दस साल से लड़ा रहा है। ये तो कब का खत्म हो जाना चाहिए था, ऐसा करो! तुम अगली तिथि को विना वकील के आना और अपने पास दो-तीन सौ रूपये रखना, समझे न भूलना नहीं, समझे न मैं क्या कह रहा हूँ। फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोले न्युनतम फाईन कितना है? मैं कहा,सर, 500 रूपये। इसपर कोर्ट कक्ष से बाहर जा रहे आरोपी को रोकते हुए कहा,सुनों, पाँच सौ रूपया लेकर आना, फिर थोड़े सकते एवं चिंतित मुद्रा में बोले,सुनों, जुगाड़ कर लोगे न! आरोपी किंकर्तव्यविमुढ़ था, वहीं न्यायिक दण्डाधिकारी आशंकित थे कि ये पैसा का इंतजाम कर पायेगा या नहीं। आरोपी को समझ में नहीं आ रहा था कि हुज़ुर आखिर ये सारी बातें उससे सीधी तौर पर न्यायिक कुर्सी पर बैठकर क्यों बोल रहें है। उसने चिंतित मन से सिर हिला दिया।

दण्डाधिकारी महोदय ने मुझे उसे मदद करने का संकेत किया, जिसे मैं समझ गया और कोर्ट कक्ष से बाहर आकर उसे समझाया। सुनों तुम वकील के विना अगली तिथि पर कोर्ट में उपस्थित हो जाना और पाँच सौ रूपया लेते आना। जो आरोप तुम पर है उसके लिए दण्ड के रूप में कम से कम पाँच सौ रूपये जुर्माना या दो साल कैद का प्रावधान है। दण्डाधिकारी महोदय कोमल हृदय के इंसान हैं। अतः तुम्हे पाँच सौ रूपया जुर्माना लेकर छोड़ देंगे और तुम्हारा केस उसी दिन समाप्त हो जायेगा। तुम किसी दलाल के चक्कर में मत आना। इतना सुनना था कि उसका चेहरा चमक गया और खुशी मन से बोला,पैसा न होतई तो कर्जा ले लेबई हुज़ुर, ई केस कसहूँ खत्म हो जाय, दस साल से पेराई गेलेई हे। (पैसा नहीं होगा तो कर्ज ले लेंगें, ये केस किसी तरह से खत्म हो जाय, दस वर्ष से परेशान हैं) तत्पश्चात अभिवादन कर वह विदा हुआ।

............क्रमशः

2 टिप्‍पणियां:

  1. कानून तो अन्धा होता है,
    परन्तु जज के सीने में भी दिल होता है।
    कहानी अच्छी लगी।
    बधाई स्वीकार करें।

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  2. श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ। जय श्री कृष्ण!!
    ----
    INDIAN DEITIES

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